रतलाम। केंद्र व राज्य सरकार बेटियों की स्वास्थ्य रक्षा के लिए भले बाल सुरक्षा सहित कई योजनाएं चला रही हो, मगर गांवों में परंपरागत चिकित्सा पद्धति का "अंधविश्वास" आज भी हावी है। ऎसा ही मामला ग्राम बिबड़ोद में सामने आया है। एक दंपति ने दो वर्षीय बेटी को कुपोषण से मुक्त करने के लिए पूजा के नाम पर गर्म सरियों से डाम (दाग) लगवाकर पूरी पीठ पर नासूर बना दिए।
ग्राम के गणेश की बेटी पूजा शारीरिक रूप से कमजोर है। सरकारी दवाइयां व आंगनबाड़ी केंद्र के पोषण आहार से जब अभिभावक संतुष्ट नहीं हुए, तो मासूम को आदिवासी बहुल बाजना ले गए और देसी उपचार शुरू किया गया। इलाज में बच्ची की पीठ पर गर्म सलाखें व सरिए के डाम लगाए गए। उपचार करीब दो माह चला। अबोध बच्ची रो-चीख कर पीड़ा सहन करती रही और अब वे घाव नासूर बन गए हैं।
"सरकार" भी रो पड़ी
खुलासा मंगलवार को उस समय हुआ, जब महिला एवं बाल विकास का अमला बाल सुरक्षा माह की शुरूआत व मंगल दिवस मनाने पहुंचा। घर के बाहर खटिया पर पेट के बल लेटी पूजा को देख अमले की आंखें भर आर्ई। पूछा तो पूजा की दादी ने बताया कि सरकारी इलाज से इसकी कमजोरी दूर नहीं हो रही थी। इसलिए बाजना में आदिवासियों के पुजारी से गर्म सरिए से दाग लगवाते हैं। अमले ने गणेश व उसकी पत्नी को मनाया और इन्हें बच्ची के साथ लेकर रतलाम स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र ले आए। अस्पताल में पूजा का वजन लगभग 5 किलो निकला तो इसे कुपोषित मानकर भर्ती कर उपचार शुरू किया गया है।
उपचार के नाम पर जलाया
बालिका को उपचार के नाम पर जलाया गया है। उसका रक्त परीक्षण करवा कर उपचार शुरू कर दिया है। उसे स्वस्थ करने का हरसंभव प्रयास कर रहे हैं।
डॉ. आरजी कौशल, शिशुरोग विशेषज्ञ, बाल चिकित्सालय प्रभारी, रतलाम
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भागवंतीदेवी ने बताया था कि गांव में दो बच्चे अतिकम वजन के हैं। परिजन इन्हें अस्पताल लाने व उपचार कराने के लिए तैयार नहीं हैं। हमने बच्ची के अभिभावकों को समझाइश दी व केंद्र ले आए।
इरफान अंसारी, परियोजना अधिकारी (रतलाम ग्रामीण)
अनिल पांचाल Sabhar: Patrika

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